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आज़माना चाहता है

मोहब्बत की क़ैद से दूर कहीं ठिकाना चाहता है…
अजीब दिल है कहीं और जाना चाहता है…..

अभी दिखाओ ना सपने सुहाने इसको,,,
ये अभी और मुस्कुराना चाहता है….

बुहत रातें गवाई है तर्क-ए-वफ़ा पर मैंने,,,
दिल की आरज़ू ये है, के मौसम सुहाना चाहता है…

दर्द हो दिल में तो फ़िर शायरी बनती है,,,
गज़ल भी अन्दाज़-ए-सितम शायराना चाहता है….

तुझ बिन भी बसर हो रही है ज़िन्दगी खुशी से,,,
इस से ज्यादा क्या तू मुझे आज़माना चाहता है…..

हर बेवफ़ा की नज़रो में , मैं यूँ खटकती हूँ,,,
मुझ गरीब को क्यों सारा ज़माना चाहता है….

मैं दिल-ओ-जान मिटा दूँ उस पर मगर,,,,
वो मोह्ब्बत को तराज़ू में बिठाना चाहता है….

इस दुनियां को यहीं दर्द खाये जाता है,,,
ये ज़िन्दगी से क्यों जान छुड़ाना चाहता है।।।

स्वरचित
©भावना आर वर्मा

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