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Ek Roz Puchhungi Tumse

मेरे कुछ सवाल है जो क़यामत के रोज़ पुछूगीं तुमसे,
क्योंकि उससे पहले तुम्हारी और मेरी बात हो सके…
इस लायक नहीं हो तुम…..

मैं जानना चाहती हूँ क्या उससे पहली मुलाक़ात में
उसकी हंसी की तरीफ़ की थी तुमने ..
जैसे मेरी किया करते थे..
क्या रात-रात भर छत पर टहल कर उससे भी बातें किया करते थे..
जैसे मुझे जगाया था तुमने,,
क्या उससे भी कसमें, वादें, उमीदें वाबस्ता थी तुम्हारी..
जैसे मुझे दिलाया करते थे…

मेरे कुछ सवाल है जो क़यामत के रोज़ पुछूगीं तुमसे,
क्योंकि उससे पहले तुम्हारी और मेरी बात हो सके…
इस लायक नहीं हो तुम…..

क्या थाम लेते थे उसका हाथ भी इस डर में कि कहीं
खो न जाये वो…
दूर तुमसे एक पल के लिये हि सही हो न जायें वो…
क्या उसको भी गिनाई है अपनी एक्स गर्ल फ्रेंड्स कि लिस्ट ..
जो नाम मुझे बताया करते थे…

मेरे कुछ सवाल है जो क़यामत के रोज़ पुछूगीं तुमसे,
क्योंकि उससे पहले तुम्हारी और मेरी बात हो सके…
इस लायक नहीं हो तुम…..

मैं जानना चाहती हूँ क्या उसको भी घुमयी है वो सारी जगह तुमने..
जहाँ सिर्फ़ मेरे साथ तुमको सुकून मिलता था..
क्या बता दिया तुमने उसको भी के विराट तुम्हारा फ़ेवरेट प्लेयर है…

मेरे कुछ सवाल है जो क़यामत के रोज़ पुछूगीं तुमसे,
क्योंकि उससे पहले तुम्हारी मेरी बात हो सके…
इस लायक नहीं हो तुम…..

मैं जानना चाहती हूँ कि उसकी , आँखो में देख के खुद को पा लिया करते हो..
उसकी साँसों में तुम घुलते हो , तो खुद को सम्भाल लिया करते हो…
क्या उसी तरह माथा चूमा करते हो उसका,
जैसे मेरा चूमा करते थे…
क्या फोन पर अक्सर बात करते-करते अब भी सो जाया करते हो…
क्या उसके नाराज़ हो जाने पर भी, तुम खाना नहीं खाया करते हो..

मेरे कुछ सवाल है जो क़यामत के रोज़ पुछूगीं तुमसे,
क्योंकि उससे पहले तुम्हारी और मेरी बात हो सके…
इस लायक नहीं हो तुम…..

क्या उसको भी तुम छोड़ दोगे मेरी ही तरह..
ये वादा भी तोड़ दोगे मेरी ही तरह..
क्या ये मोह्ब्बत भी तुम्हारी..
तुम्हारी ही तरह बेकार है..
क्या दिल लगाना, खेलना, दर्द देना, फ़िर तोड़ना..
बस यहीं तुम्हारे हथियार हैं…

मेरे कुछ सवाल है जो क़यामत के रोज़ पुछूगीं तुमसे,
क्योंकि उससे पहले तुम्हारी और मेरी बात हो सके…
इस लायक नहीं हो तुम…..
By -;
‌Bhavna R Verma

आज़माना चाहता है

मोहब्बत की क़ैद से दूर कहीं ठिकाना चाहता है…
अजीब दिल है कहीं और जाना चाहता है…..

अभी दिखाओ ना सपने सुहाने इसको,,,
ये अभी और मुस्कुराना चाहता है….

बुहत रातें गवाई है तर्क-ए-वफ़ा पर मैंने,,,
दिल की आरज़ू ये है, के मौसम सुहाना चाहता है…

दर्द हो दिल में तो फ़िर शायरी बनती है,,,
गज़ल भी अन्दाज़-ए-सितम शायराना चाहता है….

तुझ बिन भी बसर हो रही है ज़िन्दगी खुशी से,,,
इस से ज्यादा क्या तू मुझे आज़माना चाहता है…..

हर बेवफ़ा की नज़रो में , मैं यूँ खटकती हूँ,,,
मुझ गरीब को क्यों सारा ज़माना चाहता है….

मैं दिल-ओ-जान मिटा दूँ उस पर मगर,,,,
वो मोह्ब्बत को तराज़ू में बिठाना चाहता है….

इस दुनियां को यहीं दर्द खाये जाता है,,,
ये ज़िन्दगी से क्यों जान छुड़ाना चाहता है।।।

स्वरचित
©भावना आर वर्मा

Sawali si ladki

Ek sawali si ladki, be-chain be-sabar si…
Jaane kahaan kho gayi hai,
Be-khauf ho gayi hai..
Jane kya sochti hai?
Muh par dupatta daale…
Ghar vale sochte hain..
jaldi se so gyi hai…
Ek sawli si ladki… be-chain be-sabar si…..

Din bhar wo dhundti hai..
Chehra aankho me bhar ke…
Koi bhi shakhs dikhta.
Dekhe wo aah bhar ke…
Chahat me kho gayi hai,,,
Bawli si ho gayi hai..
Ek sawali si ladki, Be-chain be-sabar si…

Rehta khayal usko apna na, ab kisi ka….
Har din pehan rahi hai joda naye colour ka..
Mohabbat me wo kisi ki… diwani ho gayi hai…
Ek sawali si ladki., be-chain be-sabar si…

Sunti wo kuch nahi hai..
Kuch dhiyaan hi nahi hai..
Teacher kya keh rahi hai..
Usko khabar nahi hai..
Ek naam hatheliyon Par..
Likhti hai har pehar ab,,,
Kuch bhi na padh sakegi,,
School to gayi hai…
Ek sawali si ladki,, be-chain be-sabar si….

Wo chand ko nihare..
Taaro ko gin-gin haare,,
Khidki se usko dhunde…
Chhat se use pukaare.,,,
Jaane kya dhundti hai… ,
Kya cheez kho gayi hai…
Ek sawali si ladki,,, be-chain be-sabar si

Maa se ab baatein uski
kuch kum si ho gayi hai…
Shaheliyon se uski..
Ab Dosti nahi hai…
Achhi bhali si ladki..
Pagal si ho gayi hai…
Ek sawali si ladki be-chain be-sabar si…….
By- ;
Bhavna R Verma

Dost

Tamam tazkirah me azeem tajkirah hai dosk ka
Mano to sabse ohda or nirala safar hai dost ka

Dosti me har sakhsee pahlu ka zikra kar lete hai log
Itemade itna hai ki dil se qadar karte hai dost ka

Kabhi tabit karke lagta hai zamane me kuchh talaf kiya
Milne ke baad utna hi fikr maloom hota hai dost ka

Kisi ke dosti ka tazkirah jab bhi dekhta hu main
Guzastah zamane ka manjar nazar ata hai dost ka

Tumne to dosti ka har farz kamil ki hai Azhar
Is hayat-e safar me hamesha mutaffir ho dost ka

Bear